चाणक्य नीति chanakya neeti | चाणक्य राजनीति के सबसे अच्छे अनमोल वचन: दोस्तों आज में आपको चाणक्य के कुछ अनमोल विचारो के बारे में बता रहा हूँ जिसको पढ़ कर आप भी कुछ सिख ले सकते हैं. महाराज चाणक्य एक बहुत ही बुद्धिमान ब्रम्हाण थे. महाराज चाणक्य को अपनी बिधा से उनको आने बाले समय का भी अगात था. चाणक्य एक बहुत ही ज्ञानी थे जिनकी अधिकतर रूचि राजनीती में थी आज हम यैसे ही अनमोल विचारो के बारे में बता रहे हैं.
चाणक्य नीति chanakya neeti | चाणक्य राजनीति के सबसे अच्छे अनमोल वचन
1 : - बुद्धिमान वही है जो अपनी कमियों को किसी के सामने उजागर न करें. घर की गुप्त बातें, धन का विनाश, दुष्टों द्वारा धोखा, अपमान, मन का चिंता इन बातों को अपने तक ही सीमित रखना चाहिए.
2 : - मनुष्य अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही दुःख भोगता है, अकेला ही मोक्ष का अधिकारी होता है और अकेला ही नरक जाता है. अतः रिश्ते-नाते तो क्षण भंगुर हैं, हमें अकेले ही दुनिया के मंच पर अभिनय करना पड़ता है.
3 : - विद्वान सब जगह सम्माननीय होता है. अपने उच्च गुणों के कारण देश-विदेश सभी जगह वह पूजनीय होता है .
4 : - विद्या ही सर्वोच्च धन है. विद्या के कारण ही खाली हाथ होने पर भी विदेश में भी धन कमाया जा सकता है तथा मान सम्मान बढ़ाया जा सकता है. विद्या के अभाव में उच्च कुल में जन्मा व्यक्ति भी सम्मान नहीं पाता है.
5 : - सुपात्र को दिए गए धन का फल अनन्त काल तक मिलता रहता है. भूखे को दिए गए भोजन का यश कभी ख़त्म नहीं होता. दान देना सबसे महान कार्य है.
6 : - बिना सत्य के सारा संसार व्यर्थ है. संसार में सब कुछ सत्य पर टिका है. सत्य के तेज से ही सूर्य तपता है, सत्य पर ही पृथ्वी टिकी है, सत्य के प्रभाव से ही वायु बहती है. सत्य ही जीवन का सच है.
7 : - गधा बहुत संतोषी जीव है. थकने पर भी वह बोझ ढोता रहता है, सर्दी-गर्मी कि उसे परवाह नहीं रहती, संतुष्ट भाव से जो मिल जाये, उसी से गुजर बसर करना, ये बातें गधे से सीखनी चाहिए.
8 : - जो मनुष्य न तो विद्वान है, न दानी है, न साधक, जिसमें शीलता का अभाव है, गुणहीन है, अधर्मी है- ऐसा मनुष्य पशु के समान है. ऐसे मनुष्य पृथ्वी पर भार के समान है.
9 : - भावनाएं इंसान को इंसान से जोड़ती हैं. दूर रहने वाला भी यदि हमारा प्रिय है तो वह हमेशा दिल के पास रहता है, जबकि पास रहने वाला भी हमारे दिल से कोसों दूर ही रहता है क्योंकि उसके लिए हमारे दिल में जगह नहीं होती.
10 : - क्रोध यमराज के समान है, वह सब कुछ नष्ट कर डालता है. संतोष ही सुख-वैभव प्रदान करता है. विद्या कामधेनु के समान है और तृष्णा वैतरणी के समान कष्टकर है. हमें इन बातों को व्यवहार में लाकर इनके अनुसार ही कार्य करना चाहिए.
11 : - किसी से अपना काम निकालना हो तो मधुर वचन बोलें. जिस प्रकार हिरण का शिकार करने के लिए शिकारी मधुर स्वर में गीत गाता है.
12 : - धन महत्वपूर्ण है, जिसके पास धन है, सब उसके अपने हैं. धनवान के लिए बुरे काम भी अच्छे हो जाते हैं .मूर्ख धनवान कि बात सब सुनते हैं और अनेक मूर्धन्य विद्वान बने रहते है. (आज के युग में ये शब्द कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं.)
13 : - कोयल का रूप उसका स्वर है, पतिव्रता होना ही स्त्रियों कि सुन्दरता है. कुरूप लोगों कि विद्या ही उनका स्वरूप है तथा तपस्वियों का रूप क्षमा करना है.
14 : - सभी औषधियों में अमृत प्रधान है. सभी सुखों में भोजन प्रधान है. सभी इन्द्रियों में आँख मुख्य है. सभी अंगों में सिर महत्वपूर्ण है.
15 : - व्यक्ति के आचरण से उसके कुल का परिचय मिलता है . बोली से देश का पता लगता है. आदर-सत्कार से प्रेम का और शरीर से व्यक्ति के भोजन का पता लगता है.
16 : - मर्यादा का कभी उल्लंघन न करें।
17 : - विद्वान और प्रबुद्ध व्यक्ति समाज के रत्न है।
18 : - स्त्री रत्न से बढ़कर कोई दूसरा रत्न नहीं है।
19 : - रत्नों की प्राप्ति बहुत कठिन है। अर्थात श्रेष्ठ नर और नारियों की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है।
20 : - शास्त्र का ज्ञान आलसी को नहीं हो सकता।
21 : - स्त्री के प्रति आसक्त रहने वाले पुरुष को न स्वर्ग मिलता है, न धर्म-कर्म।
23 : - स्त्री भी नपुंसक व्यक्ति का अपमान कर देती है।
24 : - फूलों की इच्छा रखने वाला सूखे पेड़ को नहीं सींचता।
25 : - बिना प्रयत्न किए धन प्राप्ति की इच्छा करना बालू में से तेल निकालने के समान है।
26 : - महान व्यक्तियों का उपहास नहीं करना चाहिए।
27 : - कार्य के लक्षण ही सफलता-असफलता के संकेत दे देते है।
28 : - नक्षत्रों द्वारा भी किसी कार्य के होने, न होने का पता चल जाता है।
29 : - अपने कार्य की शीघ्र सिद्धि चाहने वाला व्यक्ति नक्षत्रों की परीक्षा नहीं करता।
30 : - परिचय हो जाने के बाद दोष नहीं छिपाते।
31 : - स्वयं अशुद्ध व्यक्ति दूसरे से भी अशुद्धता की शंका करता है।
32 : - अपराध के अनुरूप ही दंड दें।
33 : - कथन के अनुसार ही उत्तर दें।
34 : - वैभव के अनुरूप ही आभूषण और वस्त्र धारण करें।
35 : - अपने कुल अर्थात वंश के अनुसार ही व्यवहार करें।
36 : - कार्य के अनुरूप प्रयत्न करें।
37 : - पात्र के अनुरूप दान दें।
38 : - उम्र के अनुरूप ही वेश धारण करें।
39 : - सेवक को स्वामी के अनुकूल कार्य करने चाहिए।
41 : - पति के वश में रहने वाली पत्नी ही व्यवहार के अनुकूल होती है।
42 : - शिष्य को गुरु के वश में होकर कार्य करना चाहिए।
43 : - पुत्र को पिता के अनुकूल आचरण करना चाहिए।
44 : - अत्यधिक आदर-सत्कार से शंका उत्पन्न हो जाती है।
45 : - स्वामी के क्रोधित होने पर स्वामी के अनुरूप ही काम करें।
46 : - माता द्वारा प्रताड़ित बालक माता के पास जाकर ही रोता है।
47 : - स्नेह करने वालों का रोष अल्प समय के लिए होता है।
48 : - मुर्ख व्यक्ति को अपने दोष दिखाई नहीं देते, उसे दूसरे के दोष ही दिखाई देते हैं।
49 : - स्वार्थ पूर्ति हेतु दी जाने वाली भेंट ही उनकी सेवा है।
50 : - बहुत दिनों से परिचित व्यक्ति की अत्यधिक सेवा शंका उत्पन्न करती है।
51 : - अति आसक्ति दोष उत्पन्न करती है।
52 : - शांत व्यक्ति सबको अपना बना लेता है।
53 : - बुरे व्यक्ति पर क्रोध करने से पूर्व अपने आप पर ही क्रोध करना चाहिए।
54 : - बुद्धिमान व्यक्ति को मुर्ख, मित्र, गुरु और अपने प्रियजनों से विवाद नहीं करना चाहिए।
55 : - ऐश्वर्य पैशाचिकता से अलग नहीं होता।
56 : - स्त्री में गंभीरता न होकर चंचलता होती है।
57 : - धनिक को शुभ कर्म करने में अधिक श्रम नहीं करना पड़ता।
58 : - वाहनों पर यात्रा करने वाले पैदल चलने का कष्ट नहीं करते।
59 : - जो व्यक्ति जिस कार्य में कुशल हो, उसे उसी कार्य में लगाना चाहिए।
60 : - स्त्री का निरिक्षण करने में आलस्य न करें।
61 : - स्त्री पर जरा भी विश्वास न करें।
62 : - स्त्री बिना लोहे की बड़ी है।
63 : - सौंदर्य अलंकारों अर्थात आभूषणों से छिप जाता है।
64 : - गुरुजनों की माता का स्थान सर्वोच्च होता है।
65 : - प्रत्येक अवस्था में सर्वप्रथम माता का भरण-पोषण करना चाहिए।
66 : - स्त्री का आभूषण लज्जा है।
67 : - ब्राह्मणों का आभूषण वेद है।
68 : - जिस शहर में विद्वान, बुद्धिमान, ज्ञानी पुरुष नहीं रहते, जहां के लोग दान नहीं करना जानते, जहाँ अच्छे काम करने में कोई चतुर न हो, किन्तु लूट- खसोट, बुरे चाल-चलन में सभी एक से बड़कर एक हों. ऐसी जगह को गंदगी का ढेर ही समझना चाहिए और वहां के लोगों को गंदगी के कीड़े .
69 : - जैसे फलों में गंध, तिलों में तेल, काष्ठ में अग्नि, दुग्ध में घी, गन्ने में गुड़ है, उसी तरह शरीर में परमात्मा है. इसे पहचानना चाहिए.
70 : - साधुजन के दर्शन से पुण्य प्राप्त होता है. साधु तीर्थों के समान होते हैं, तीर्थों का फल तो कुछ समय बाद मिलता है, किन्तु साधु समागम तुरंत फल देता है’
71 : - ईश्वर ना काष्ठ में है, न मिट्टी में, न ही मूर्ति में. वह केवल भावना में होता है. अतः भावना ही मुख्य है.
72 : - लक्ष्मी चंचल है. प्राण, जीवन, शरीर सब कुछ चंचल और नाशवान हैं. संसार में केवल धर्म ही निश्चल है.
73 : - सभी व्यक्तियों का आभूषण धर्म है।
74 : - विनय से युक्त विद्या सभी आभूषणों की आभूषण है।
75 : - शांतिपूर्ण देश में ही रहें।
76 : - जहां सज्जन रहते हों, वहीं बसें।
78 : - राजाज्ञा से सदैव डरते रहे।
79 : - राजा से बड़ा कोई देवता नहीं।
80 : - राज अग्नि दूर तक जला देती है।
81 : - राजा के पास खाली हाथ कभी नहीं जाना चाहिए।
82 : - गुरु और देवता के पास भी खाली नहीं जाना चाहिए।
83 : - राजपरिवार से द्वेष अथवा भेदभाव नहीं रखना चाहिए।
84 : - राजकुल में सदैव आते-जाते रहना चाहिए।
85 : - राजपुरुषों से संबंध बनाए रखें।
86 : - राजदासी से कभी शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए।
84 : - राजधन की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखना चाहिए।
85 : - पुत्र के गुणवान होने से परिवार स्वर्ग बन जाता है।
86 : - पुत्र को सभी विद्याओं में क्रियाशील बनाना चाहिए।
87 : - जनपद के लिए ग्राम का त्याग कर देना चाहिए।
88 : - ग्राम के लिए कुटुम्ब (परिवार) को त्याग देना चाहिए।
89 : - पुत्र प्राप्ति सर्वश्रेष्ठ लाभ है।
90 : - प्रायः पुत्र पिता का ही अनुगमन करता है।
91 : - गुणी पुत्र माता-पिता की दुर्गति नहीं होने देता।
92 : - पुत्र से ही कुल को यश मिलता है।
93 : - जिससे कुल का गौरव बढे वही पुरुष है।
94 : - पुत्र के बिना स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती।
95 : - संतान को जन्म देने वाली स्त्री पत्नी कहलाती है।
96 : - एक ही गुरुकुल में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का निकट संपर्क ब्रह्मचर्य को नष्ट कर सकता है।
97 : - पुत्र प्राप्ति के लिए ही स्त्री का वरण किया जाता है।
98 : - पराए खेत में बीज न डाले। अर्थात पराई स्त्री से सम्भोग (सेक्स) न करें।
99 : - अपनी दासी को ग्रहण करना स्वयं को दास बना लेना है।
100 : - विनाश काल आने पर दवा की बात कोई नहीं सुनता।
101 : - देहधारी को सुख-दुःख की कोई कमी नहीं रहती।
102 : - गाय के पीछे चलते बछड़े के समान सुख-दुःख भी आदमी के साथ जीवन भर चलते है।
103 : - सज्जन तिल बराबर उपकार को भी पर्वत के समान बड़ा मानकर चलता है।
104 : - दुष्ट व्यक्ति पर उपकार नहीं करना चाहिए।
105 : - उपकार का बदला चुकाने के भय से दुष्ट व्यक्ति शत्रु बन जाता है।
106 : - सज्जन थोड़े-से उपकार के बदले बड़ा उपकार करने की इच्छा से सोता भी नहीं।
107 : - देवता का कभी अपमान न करें।
108 : - आंखों के समान कोई ज्योति नहीं।
109 : - आंखें ही देहधारियों की नेता है।
110 : - आँखों के बिना शरीर क्या है?
111 : - जल में मूत्र त्याग न करें।
112 : - नग्न होकर जल में प्रवेश न करें।
113 : - जैसा शरीर होता है वैसा ही ज्ञान होता है।
114 : - जैसी बुद्धि होती है , वैसा ही वैभव होता है।
115 : - स्त्री के बंधन से मोक्ष पाना अति दुर्लभ है।
116 : - तपस्वियों को सदैव पूजा करने योग्य मानना चाहिए।
117 : - पराई स्त्री के पास नहीं जाना चाहिए।
118 : - अन्न दान करने से भ्रूण हत्या (गर्भपात) के पाप से मुक्ति मिल जाती है।
119 : - वेद से बाहर कोई धर्म नहीं है।
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